क्या आस्था मनोरंजन का विषय है

द्वारा संपादित ,अपडेट किया गया: 24 जून, 2023 05:18 पूर्वाह्न

क्या आस्था मनोरंजन का विषय है?

पिछले कुछ दिनों से एक फिल्म को लेकर देश भर में काफी विवाद चल रहा है। कारण यह है कि इस फिल्म में गुफाओं और गुफाओं के खेल दिखाए गए हैं। समाज का एक बड़ा हिस्सा, धार्मिक गुरु और संत और राजनीतिक दल फिल्म के कलाकार हर मंच पर मौजूद हैं। बबी के…

पिछले कुछ दिनों से एक फिल्म को लेकर देश भर में काफी विवाद चल रहा है। कारण यह है कि इस फिल्म में गुफाओं और गुफाओं के खेल दिखाए गए हैं। समाज का एक बड़ा हिस्सा, धार्मिक गुरु और संत और राजनीतिक दल फिल्म के कलाकार हर मंच पर मौजूद हैं। बस्ती के लोग सोशल मीडिया पर इस फिल्म को दुनिया भर से काफी ट्रोल भी किया गया है।

सवाल यह है कि आप मनोरंजन के लिए आस्था से क्या खरीद सकते हैं? आस्था मनोरंजन का विषय क्या है? रामायण पर आधारित फिल्म ‘आदिपुरुष’ के कलाकारों ने इस फिल्म में कुछ शैलियों का फिल्मांकन किया है, जो कि भावनाओं को साझा कर रहे हैं। इसके साथ ही इस फिल्म में बोले गए कई ऐसे डायलॉग्स भी हैं जो कि सभ्य नहीं माने जा सकते। जैसे ही विवाद बढ़ा तो फिल्म के निर्माता और संवाद लेखक ने अपनी पुरानी मिट्टी से पलटते हुए यह सफाई दी कि ”यह फिल्म रामायण पर आधारित नहीं है बल्कि रामायण से प्रेरित है।” घोषणा भी कर दी गयी है।

देश भर के कई हिंदू संगठन इस फिल्म के विरोध में मुख्तार उतर आए हैं। कई कलाकारों ने तो फिल्म के कलाकारों को फिल्म के किरदारों की भाषा में खतरनाक तक नष्ट कर दिया है। इन सार्वभौम सुपरमार्केट पुलिस ने लेखक और निर्माता को सुरक्षा भी दी है। पड़ोसी देश नेपाल से भी इस फिल्म के विरोध की खबरें आ रही हैं। कहा जाता है कि ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा’। तो किस फिल्म के कलाकार ने इसी अनुशासन से यह फिल्म बनाई? या फिर किसी अन्य एजंडे के तहत ऐसी फिल्में योजनाबद्ध तरीके से बनाई गई हैं जो समाज में समानता पैदा करने का काम करती हैं? यहां पर ये कहा गया है कि ठीक है कि ऐसी फिल्में ना सिर्फ एक तरफा होती हैं बल्कि असलियत से भी काफी दूर होती हैं।

वृंदावन में कई वर्षों से भजन कर रहे रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी ने हाल ही में अपनी फिल्म ‘आदिपुरुष’ और इसी तरह की अन्य फिल्मों पर अपनी कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि, ”आस्था मनोरंजन का विषय नहीं है।” मनोरंजन कभी आस्था नहीं हो सकता और आस्था का साथ नहीं होना चाहिए। भगवान की लीलाएँ हमारी आस्था का विषय हैं। जो भी चाहता है मनोरंजन की दृष्टि से वह हमारी आस्था के साथ जुड़ता है।”

इस विषय पर स्वामी जी आगे कहते हैं कि, ”श्री कृष्ण लीला हो या श्री राम लीला, यह एक निषेध के अंतर्गत ही प्रकट होता है। यदि कोई मनोरंजन की भावना को चित्रित करता है, तो उसका उपहास करता है या उसे अनुचित रूप से प्रतिबंधित करता है, तो वह जो भी अपराधी होता है, उसे दंड अवश्य मिलता है। इन लीलाओं को बड़े-बड़े ऋषियों ने जैसा समाधि लगा कर देखा, वैसा ही लिखा। मित्रता लीला के चरित्रों के बल पर संतगण के भक्तों को सही मार्ग पर चलने का उपदेश दिया गया है। ”

स्वामी जी कहते हैं कि ”भगवान और उनकी लीला मनोरंजन की चीज नहीं है।” प्रिया: यह देखा गया है कि सामने वाले को रिझाने के दर्शन से सत्संग और लीला गायन को मनोरंजन बनाया जा रहा है।” सभी से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि, ”शास्त्र सम्मत भागवत चरित्र सुने। के दर्शन करें, मठ न की जाए।” इस विषय पर श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण स्वामी जी का विस्तृत वीडियो यूट्यूब पर उपलब्ध है।

एक समय था जब ‘जय संतोषी मां’, ‘संपूर्ण रामायण’ जैसी फिल्में धार्मिक श्रद्धा के साथ बनाई जाती थीं। इन फिल्मों को लोग पूरी आस्था के साथ देखते थे। सिनेमा हॉल में फ़िल्में बाहर निकलती थीं, फ़िल्म को देखते हुए भक्ति रस में डूब कर रोती थीं और फ़िल्म के समापन के बाद श्रद्धा से पैसे भी चढ़ाते थे। आपको याद होगा जब दूरदर्शन पर रामानंद सागर और बी.आर. चोपड़ा निर्मित ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ का टेलिकास्ट तब हुआ जब टैब्लेट पर ऐसा सादा सच था कि सरकार ने कफरू लगा दिया हो।

लेकिन जिस तरह की धार्मिक चोला ओढ़ कर मनोरंजन और एडांडे के तहत बनाई गई जाने वाली फिल्में बनाई जा रही हैं वह सिर्फ विवाद भड़काने का काम कर रही हैं। किसी भी सभ्य समाज में आस्था को तोड़-मरोड़ कर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए सरकार को एक निश्चित दिशा-निर्देश देने की आवश्यकता है, ताकि ऐसी कोई भी फिल्म न बनाई जा सके जो किसी भी धर्म के अनुयायियों की आस्था को साझा कर सके।-रजनीश कपूर

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